लो होली इस बार भी है आई
अनगिनत सपने यह दोहराई।
क्या कहूं क्या कारण है बनाई
जाने क्यों मन को यह ना भाई।
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याद बचपन की अनेक उमड़ी,
लेकर पिचकारी और रंग बाल्टी
पैरों में हवा ने जैसे मेहंदी लगाई,
मैं उस टोली से जा मिल आई।
हुड़दंग मचाती टोली में खोई
पकवान की खुशबू पीछे छोडी
आंजकर मां के प्यार का काजल
सखियों बन गई मैं पचरंगी बादल।
लाल से गाल, हरा माथे घिस कर
पोटीन पेंट की पक्की छाप सजा कर
लौटे घर हम आधा दिन बिता कर
फिर नहाते अपटन घिस घिस कर ।
तैयार तुरंत हो जाते अबीर लेकर ।
पाते शगुन, प्रणाम बड़ों के पैर छूकर
खिलखिलाते निकले मतवाले बनकर
मन भरकर गुलाल से सराबोर हो कर!
बीते दिनों की यादों को चली मैं सहेजने
पिचकारी के रंग सब आज खाली करने
व्यस्त हूं मैं, मगर बहकाती हैं यादें
जाऊं कहां इस उम्र में होली खेलने ?