मानसरोवर काव्य मंच
दिनांक -१७-३-२५
शीर्षक -“तुमको लगता है कि”
विधा- गीत
"तुम को लगता है...."
तुम को लगता है कि तुम मुझसे जीत गये .
फक्र हमें हैं,मुस्कान पर तेरे दिल हार गए ।
तुमको लगता ….
तुम इसे जीत समझकर गुमान करते हो.
तेरी मुस्कान का सौदा हम इससे करते हैं ।
तुमको लगता है …
तेरा रुठना भी हमें बहुत भला लगता है .
इस बहाने करीब तुम्हारे हम आते हैं।
तुम को लगता है
इकबार ,एक नजर मुझे तुम देख लेते हो
कसम तुम्हारी इस बहाने मैं भी जी उठता हूं।
तुमको लगता है …
ज्यादा नहीं बस एक ही इनायत चाहता हूं .
अलविदा कहने से पहले एक नज़र देख लेना।
तुम को लगता है …
मैं अपनी हार का जश्न खुशी से मनाऊंगा .
तेरी नाराजगी को होली के रंगों से सजाऊंगा।
तुम को लगता है ….
स्वरचित रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।
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