सद्कर्म ही मेरे जीवन की पूंजी है।

हिन्दी सृजन सागर
दैनिक प्रतियोगिता
विषय:सत्कर्म ही मेरे जीवन की पूंजी है
तिथि २५.३.२५

सत्कर्म ही ही मेरे जीवन की पूंजी है।

लेकर जिस को उड़ता प्रारब्ध पंछी है।

देन लेन का काम सब इसके जिम्मे है।

अपने बस में बस यही एक कृत कर्म है।

समर्थ मनुष्य भी, कुछ और ढोल पाता है।

अन्त समय दोनों हाथ खाली रह जाता है।

कितना भी हिसाब-किताब वह कर जाये।

साथ की झोली सिर्फ सत्कर्मों से ही भर पाऐ।

महल अटारी सब निरर्थक खड़ी नजर आए।

नेपथ्य में पंछी बन श्वास क्षण भर में खो जाये।

मात ,पिता, पत्नी, पुत्र बांधव देखते रह जायें।

एक सत्कर्म की गठरी ही भवसागर पार करावे।

बन कर हीरे मोती सद्कर्म नवजीवन चमकाये।

सद्विचार-सदव्यवहार से नव-पथ सार्थक बनाएं।

स्वरचित एवं मौलिक रचना।

शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।

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