“आज की मीरा”
नहीं कहने को बचा था,उसके पास एक तारे की बात।
ना वह नाच सकती थी, लेकर भजन भक्तिको साथ ।
प्रयत्न कर वह सुर योग की, कुछ बुन लेती आज।
प्रशिक्षण लिया ध्यान लगाना, मध्यम धुन साज।
गोद बिठाया बाल कृष्ण को निर्मलताके साथ।
मन ही मन करती उनसे अपनी कई सारी बात।
तोड़ जिम्मेदारी का चक्र ,बांध ना पाती मन।
बस कुछ क्षण को, खो जाती सुन मधुर भजन।
वह गृह त्याग ना पाती, उस मीरा से है जीवन भिन्न।
मजबूरी की डोरी से रहता है बंधा उसका प्रण।
तोड़ समाज का बंधन, विषपान की जुटा ना पाती शक्ति।
मोक्ष दायी रिश्ते को वह कभी अपना ना पाती।
दिशाहीन होकर वह अल्हड़ अक्सर भटक सी जाती।
जल न पाती उससे देर तक,ईश लगन की ज्योति।
चोला पहन कुछ क्षण वह प्रति छाया ही बन पाती।
रुप सजाती मीरा सी पर एक तारा ना गुंजा पाती।
सांसारिक कर्तव्य बंधी,सदा वह उलझी रहती।
अपना कर परिवार, बस धर्म निभाया करती।
स्वरचित एवं मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।