बीतते जाते हैं दिन महीने साल
हंस कर देख सूरज से पूछा हाल
बदल गए जीव संसार के सभी
पर तनिक ना बदला तेरा हाल!
ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा पथ पर
प्रेरित हो,तुझको देख रहा है नर
यही बना है सहसा उसका काल
स्वामित्व क्षितिज आकाश लेकर!
फ़ुरसत नहीं चैन के पल दो पल भी
पलकों में रहती छिपी आकांक्षा तितली
दिन महीने साल लिए जीवन उड़ जाता
बिसरी सीमाएं याद नहीं आती कभी !
क्या उड़ना ही है मेरी जन्म का उद्देश्य
रचनाकार से रहा नहीं जब कोई सापेक्ष
छूटा उससे पुराना हमारा सारा रिश्ता
जिसकी अपेक्षा में भूला दिव्य साक्ष्य!
अब जब दिन चला सूर्यास्त की ओर
पकड़ रहे बीते दिन- महीने की डोर
निरस्त्र देख रहे खग हुआ नभ आसीन
थक चुका शरीर का हर अंग हर पोर!