बीते दिन महीने साल
बीतते जाते हैं दिन महीने साल देख सूरज को, हंस कर पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा दिवा काल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा अपने पथ पर। हो अचम्भित,तुझको देख रहा है नर। तेरा चमकना नभ पर बना उसका काल स्वामित्व पाना चाहता, तुझको समेट कर! फ़ुरसत नहीं चैन के लेता नर एक पल भी, पलकों में फड़कती रहतीआकांक्षा तितली। लिए समय को साथ,उड़ती जीवन की कली बीते जीवन की याद तब बहुत है तरसाती ! क्या उड़ते रहना ही है जन्म का उद्देश्य? सामर्थ्य से अब रहा नहीं कोई सापेक्ष! चक्र …