अबकी होली न भाई!

लो होली इस बार भी है आई अनगिनत सपने यह दोहराई। क्या कहूं क्या कारण है बनाई जाने क्यों मन को यह ना भाई। । याद बचपन की अनेक उमड़ी, लेकर पिचकारी और रंग बाल्टी पैरों में हवा ने जैसे मेहंदी लगाई, मैं उस टोली से जा मिल आई। हुड़दंग मचाती टोली में खोई पकवान की खुशबू पीछे छोडी आंजकर मां के प्यार का काजल सखियों बन गई मैं पचरंगी बादल। लाल से गाल, हरा माथे घिस कर पोटीन पेंट की पक्की छाप सजा कर लौटे  घर हम आधा दिन बिता कर फिर नहाते अपटन घिस घिस कर । तैयार तुरंत … Continue reading »अबकी होली न भाई!

Thanking You is not Easy

It’s not at all easy to thank You! innumerable requests  in queue. Time and again  more added anew Each  with an emergency in view! exceptional power,reliable support! You, the only solution for me to hold More valuable than any other gold! Life ‘s experience  manyfold told! There’s none on whom the soul can count In your power,expectations are bound All is a desert except in your elixir found,   Fulfilling Music of dreams hopes limitless sound! I know not how to thank your grace Your divinity runs  insurmountable pace Never my  experiences can ever trace left I am captured in … Continue reading »Thanking You is not Easy

क्या क्या दूं आशीष?

तुम्हीं बताओ बेटी मेरी, दूं तुम्हें क्या आशीष । तुमसे है आल्हादिनी सेवित धारा की कशिश।। कृतार्थ मन मेरा,नत्मस्तक चरणों में तेरे शीश। रुकती नहीं धारा ,भाव बहते बन अश्रू रंजीत।। प्रति-पल देती मुझेको छाया, बन वीरांगना नारी। मेरे कष्टों की जैसे तुम्हे मिली,ईश्वर से जिम्मेदारी।। कभी ना आस किया था, जायी बनेगी मेरी जननीं। हुई अवतरित जीवन में मेरे, बनकर अम्रृत संचिनी।। हर प्रश्न का उत्तर वह मेरे,अकेलेपन की वह संगिनी। सूर्य की गर्म किरणों में, शीतलता की वह है टहनी।। होता समय ना साथ मेरे,वह आती बन कर सहारा। अपनी बातों से देती श्याम नभ को जगमगाता तारा।। … Continue reading »क्या क्या दूं आशीष?

मां, दूं मैं तुम्हारा क्या परिचय?

“अमृतांजली” के लिए –तारीख:१४.२.२५विधि: कविताविषय -मां/ममताशीर्षक-“मां,तुम ही कहो!” मां तुम्हीं कहो,दूं क्या मैं तुम्हारा परिचय? मेरी ज़िन्दगी ने लिखा तेरे नाम हर विजय ।। रहता सजा हाथों में जिसके हैं अभयदान सदा।देख मुझको चिर उद्गमित होती उसकी ममता।। जानती नहीं तू रात और दिन कभी में कोई फर्क ।छुपा है तुम्हारे आदान-प्रदान में निश्छल प्रेम अर्क।। आकांक्षाओं के ताबीर से,खुद को रखती बहुत दूर ।श्वास में है तुम्हारे अपने ललन- ललनाओं का नूर।। जिसकी हस्ती के आगे स्वर्ग भी होता नतमस्तक।आज तुम्हारे चरणों में देती तेरी हर संतान दस्तक।। मेरी आंखों की रौशनी, ज़बान में भाषा है तुमसे।इस जीवन की … Continue reading »मां, दूं मैं तुम्हारा क्या परिचय?

बीते दिन महीने साल

बीतते जाते हैं दिन महीने साल देख सूरज को, हंस कर पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा दिवा काल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा अपने पथ पर। हो अचम्भित,तुझको देख रहा है नर। तेरा  चमकना नभ पर बना उसका काल स्वामित्व पाना चाहता, तुझको समेट कर! फ़ुरसत नहीं चैन के लेता नर एक पल भी, पलकों में फड़कती रहतीआकांक्षा तितली। लिए समय को साथ,उड़ती जीवन की कली बीते जीवन की याद तब बहुत है तरसाती ! क्या उड़ते रहना ही है जन्म का उद्देश्य? सामर्थ्य से अब रहा नहीं कोई सापेक्ष! चक्र … Continue reading »बीते दिन महीने साल

दिन महीने साल

बीतते जाते हैं दिन महीने साल हंस कर देख सूरज से पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा हाल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा पथ पर प्रेरित हो,तुझको देख रहा है नर यही बना है सहसा उसका काल स्वामित्व क्षितिज आकाश लेकर! फ़ुरसत नहीं चैन के पल दो पल भी पलकों में रहती छिपी आकांक्षा तितली दिन महीने साल लिए जीवन उड़ जाता बिसरी सीमाएं याद नहीं आती कभी ! क्या उड़ना ही है मेरी जन्म का उद्देश्य रचनाकार से रहा नहीं जब कोई सापेक्ष छूटा उससे पुराना हमारा सारा रिश्ता जिसकी अपेक्षा … Continue reading »दिन महीने साल

दिनकर भैया!

क्या कहकर मैं खुद को समझाऊं उन वादों को आज कैसे मैं  दोहराऊं। त्योहार पर जब हम सब  मिलते थे अश्रुजल से विदा आप हमें करते थे। अब कहो कौन वैसे हमें लौटायेगा? हम सबकी हौसला अफजाई करेगा? परिवार के दिनकर,भैया आप ही थे ! आपकी छाया हम भाई-बहन जीते थे! दे ना सकते हम आपको कभी विदाई! राह सदा दिखाना,बने रहना “बड़के भाई”! स्वरचित एवं मौलिक। छम्मो ता:-२०.१२.२४

मंच को नमन।

महिला काव्य मंच रांचीतारीख -२०-१२-२४विषय -मां/ममताशीर्षक- मां तुम्हीं कहो,दूं क्या मैं तुम्हारा परिचय हमारी ज़िन्दगी ने लिखा तेरे नाम  हर विजय । रहता सजा हाथों में जिसके हैं अभयदान सदा,देख  मुझको चिर उद्गमित होती  उसकी ममता! जानती नहीं तू रात और दिन कभी में कोई फर्क ,छुपा है तुम्हारे आदान-प्रदान में निश्छल प्रेम अर्क! आकांक्षाओं के ताबीर से,खुद को रखती बहुत दूर ,श्वास में है तुम्हारे अपने ललन- ललनाओं का नूर! जिसकी हस्ती के आगे स्वर्ग भी होता नतमस्तक,आज तुम्हारे चरणों में देती तेरी हर संतान दस्तक! मेरी आंखों की रौशनी, ज़बान में भाषा है तुमसे!इस जीवन की पहचान, तुम्हारे … Continue reading »मंच को नमन।

OumA very happy birthday to you, Pai! जीवन में जन्मदिन का वजूद विशाल होता हैएक दिन ही सही, सागर -सौभाग्य बरसाता है। ज़रूरी नही ,मजलिस लगे,दावतों का हो सिलसिला!पता नही फिर भी क्यों इस दिन बढ़ जाती हैउमंगे-हौसला? यह कोई नई बात नही, बचपन से रहा इसका दबदबा !सभी अग्रज के आशीष का सच्चा साकार है फलसफा ! सूर्योदय से ही जन्नती खुशहाली शान से छाई रहती थीउपहार की फर्माइश के पीछे कितनी साजिश होती थी। छोटी फेहरिस्त की गुफ़्तगू सुबह शाम सखिया बतियाती थीं।गुड़िया संग दूल्हा ,उनकी शादी मे बनेगी सखियां ही बाराती! कौन क्या देगा,कई दिन से इसका … Continue reading »

; ” THE UNSURMOUNTABLE”

Many a time, I wonder, watching the fleeting Clouds! They come and go without looking into any other direction, as if they were blinded from all sides alike a carriage horse, that cannot see anything, except its predestined path of journey! I wish I could send words of friendship and compassion request to these monsoon cloudes! I feel an urge ! I wish I could make it understand how dearly each of us , far and near, from the high mountains to the valleys, from the green grasslands to the dry desert sandy regions, from the temperate forests to the … Continue reading »; ” THE UNSURMOUNTABLE”