गुनगुना रही है ज़िन्दगी

गीत नया गुनगुना रही है ज़िन्दगी । खुल रही बात बहुत जिसमें अनसुनी । पुरानी वो उलझनें सारी सुलझ रही। सनातन तत्व की तस्वीर नई बन रही। खेल पर किस्मत के पहले रोती थी। नसीहतों से बहुत दूर मैं भागती थी। क्यों होता है ऐसा, मैं उलझ जाती थी। कैसे बदलू सबको,समझ ना पाती थी। सुन कर गीत उसका, सत्य समझ गई । बह रही थी मस्त वह धुन गुनगुनाती हुई । बगैर जाने मैं  कौन और क्या हूं चाहती। उसके साथ बस मैं भी वहीं गीत गाने लगी। इर्द-गिर्द अपने मैं अब देखती नहीं । बहे जिस ओर हवा, … Continue reading »गुनगुना रही है ज़िन्दगी

I know not

Lying on bed and taking rest Is not what I would like to have Rather a path of action to brave Your grace ever abundantly pave. What’s there in your bag for me O krishna soon peep in  to tell me As years do score , life fatal be I wonder what will open for me? Can’t those days be returned again To move my limbs without a pain memory intact, logic reasons sane Courage on flight, fright on bane? O lord

बीते दिन महीने साल

बीतते जाते हैं दिन महीने साल देख सूरज को, हंस कर पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा दिवा काल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा अपने पथ पर। हो अचम्भित,तुझको देख रहा है नर। तेरा  चमकना नभ पर बना उसका काल स्वामित्व पाना चाहता, तुझको समेट कर! फ़ुरसत नहीं चैन के लेता नर एक पल भी, पलकों में फड़कती रहतीआकांक्षा तितली। लिए समय को साथ,उड़ती जीवन की कली बीते जीवन की याद तब बहुत है तरसाती ! क्या उड़ते रहना ही है जन्म का उद्देश्य? सामर्थ्य से अब रहा नहीं कोई सापेक्ष! चक्र … Continue reading »बीते दिन महीने साल

दिन महीने साल

बीतते जाते हैं दिन महीने साल हंस कर देख सूरज से पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा हाल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा पथ पर प्रेरित हो,तुझको देख रहा है नर यही बना है सहसा उसका काल स्वामित्व क्षितिज आकाश लेकर! फ़ुरसत नहीं चैन के पल दो पल भी पलकों में रहती छिपी आकांक्षा तितली दिन महीने साल लिए जीवन उड़ जाता बिसरी सीमाएं याद नहीं आती कभी ! क्या उड़ना ही है मेरी जन्म का उद्देश्य रचनाकार से रहा नहीं जब कोई सापेक्ष छूटा उससे पुराना हमारा सारा रिश्ता जिसकी अपेक्षा … Continue reading »दिन महीने साल

मंच को नमनमान सरोवर काव्य मंच।शीर्षक -यह कलियुग है जनाबतारीख -१२.१२.२४विधा-कविता          “यह कलियुग है!” यह कलियुग है जनाब, चलता जहां अनियमितता की शक्ति।, लूट-पाट चोरी का है बोलबाला और गुंडों की दबंगई। धन के रंग से फर्क नहीं पड़ता,धन वाले पाते इज्जत। लिबास पहन कर सोफीयाना, सीधे लोगों को करते बेइज्जत! गरीब की होती एक जाति, उसे मिलती छूट खाली पेट सोने की। चारित्रिक उत्सर्ग का मापक है गाड़ी,गहना और हवेली । बेटी बहू और पत्नि में अब रहा ना कोई फर्क। गलबईयां डाले सब घूमें साथ,आवे ना किसी को शर्म! मात पिता के धन पर,बच्चे जमाते अपना गद्दारी … Continue reading »

लेखनी का संसारभाव प्रतिबिम्ब चित्र आधार शब्द:बेबसी की जंजीरदिनांक -११.१२.२४ ये कैसा दिया है पंख मुझे ,कैची धार बीच जो है सजे?बंधन छोर मुख बीच फंसे,दोनों का घातक खेल चले! भूख अपनी मिटा नहीं सकती,बातें अपनी कह नहीं सकती।खुली ज़बान तो होऊंगी परकटी,आप ही दो बबूल बीच अटकी! लाचारी भरी है  मेरी मनोदशा,काल-कलुषित कर नारी की दशा।पद-पेट,तन-मन , चारों को फंसा,व्यक्त कर रही दुराचारियों की कुंठा! क्या न्यायिक है यह आचार समाज काबांधना था यूं अस्त्र बीच जीवन सपनालवण चटा,लिया ना क्यों प्राण उसकाउठता ना कभी प्रश्न उसकी स्वतंत्रता का! स्वरचित एवं मौलिक रचना। शमा सिन्हारांची, झारखंड। दिनांक -११.१२.२४

     “उम्मीद का हश्र “

क्यों बार बार इस उधेड़-बुन में रहती हूं। नई उम्मीद के साथ मैं राह निहारती हूं । इस बार शायद मेरा हाल तुम पूछोगे। दुखती मेरी रगों को तुम सहलाओगे। हाथों में लेकर हाथ हृदय से लगाओगे! मेरी शिकायत तुम आज दूर कर पाओगे । हर बार अपनी ज़िद पर तुम अड़े रहते हो! हर बार यूंही मेरी आरज़ू को मात दे जाते हो! मेरी तकलीफ़ तुम पर बेअसर हो गई है ! क्यों वो,अपने वादे तुम्हें अब याद नहीं है? मेरी पुकार तुम पर अब असर नहीं करती? ऐसे ही मिटा गये तुमने सारी हस्ती हमारी ! इतनी जुदाई, फिर … Continue reading »     “उम्मीद का हश्र “

“मुझे चाहिए!”

एक सखा  सौहार्दपूर्ण चाहिए जो सुन ले। मेरी हर बात अपने पास सुरक्षित रख लें।। गलतियों को मेरी ढक कर दफन जो कर दे। दुखते जिगर के तार को स्पर्श कर सुकून दे ।। गम्भीर उसके बोल यूं हृदय में मेरे पैठ जायें। सुनकर जिसे मिट जायेअपेक्षा-मनोव्यथायें।। हो उसके पास ऐसा वह धन, सन्तोष की ताबीर। रंग दे सहज मन को खुश्बू में जैसे गुलाल-अबीर।। जरूरी नही,रहे वह गिरफ्त में मेरे पास सदा। लेकिन करले स्वीकार मेरी अच्छी-बुरी अदा।। तटस्थ वह रहे सदा जैसे सूर्य का नया सवेरा। भरा हो जिसमें चहचहाहट , मुस्कुराता चेहरा।। मेरे हर अनुभव को कर … Continue reading »“मुझे चाहिए!”

“”शुभ होगा मंगल -मय वर्ष 2021 सबका!”

शुभ-सूर्य ,का आशीर्वचन,होगा शुभ वर्ष 2021सबका! शुभकामना प्रभारित करेगा, चहु ओर शुभता सागर का। शुभ रंग -रूप धारण कर यह सबका सपना पूर्ण करेगा। शुभ- शुभ्र होगा प्रतिबिंब, सबकी अपेक्षित आकाशंओ का । शुभ- सौभाग्य से शीघ्र ही, विश्व प्रारब्ध आच्छादित होगा। शुभ स्वस्थ-मधुर स्वर कलरव ध्वनित, सबका घर आगंन होगा शुभदायक शुभाशीष लिए, मंगल मय2021फलदायक होगा। शुभकामना प्रभारित करेगा, चहु ओर शुभता सागर का। शुभ रंग -रूप आशा धारण कर यह सबका सपना पूर्ण करेगा, शुभ- नवरंग प्रतिबिंब होगा, सबकी अपेक्षित आकाशंओ का । शुभ- स्वर्ण किरणो से शीघ्र, विश्व प्रारब्ध आच्छादित होगा। शुभ स्वस्थ-मधुर स्वर ध्वनित, सबका निज … Continue reading »“”शुभ होगा मंगल -मय वर्ष 2021 सबका!”

बादल का आना

रंग छाया नभ पर श्यामल। जैसे उड़ा अंगवस्त्रं  मलमल।। काला हुआ सावन का अचकन । आंखों से उसके रंगा पसरा अंजन।। पंख फैलाकर आए उडते  बादल । बिजली ने कौंधाया चांदनी चपल।। परिंदे,खोज रहे घोंसले की दिशा। जाग रही चहुंओर जीवन जिजीविषा।। स्वरचित एवं मौलिक शमा सिन्हा रांची।