जबसे मुस्कुराना

शिकायतें सारी हो गईं हैं अब पानी हुनर सीखा है जबसे होठो ने धानी दूूर हो जाती है इससे कई परेशानी बिना बोल, बोलती यह ऐसी वाणी ! पास रहता सबके,यह धन होता ऐसा ! फर्क इतना, हम रखते नही अपने जैसा तोलते सुकून से नही, बना बाट पैसा! फिर सख्त होठ दे ना सकेंगे बैन वैसा! आंख देखेंगी,दिमाग पहनेगा नया चोंगा सबसे मिल कर भी गैरियत ही पलेगा पैसे की हवस ने बदला है वह प्यारा जमाना अपनापन बिसराया,हम भूले जबसे मुस्कुराना! 6-2-24

कैक्टस

देख कांटे अनेक उसके सब कहते,”दूर रहो!” पर वह मस्त मौला गुंजारता”मुझसा जियो!” मैनें पूछ ही दिया,”ऐसी क्या बात है तुम में?” बताओ ,क्या है बल,क्यों इतना शोर मचा रहे?” “समझ जाओगी,बस कुछ ठहर जाओ मेरे पास!” मैं चकित थी,स्वर में भराथा उसके स्नेह सुबास। दिखाया उसने,निकट ही खिला उसके गुड़हुल पुष्प। एक पहर बीता,शाम के साथ मुर्झा,वह हुआ शुष्क। “अलविदा दोस्त!”कह, वह सुर्ख स्मित फूल हुआ सुप्त! पूछा कैैकटस ने”अरे, तुम्हारी सुंदरता क्यो हुई लुप्त ?” “काया कोमल थी मेरी! ना सह सकी कटु सूर्य प्रहार ! तुम बलवान हो मित्र!तुम सह सकते हो प्राकृतिक वार! फिर कभी होगी … Continue reading »कैक्टस

खुशियों की सरगम/

आजाने से तुम्हारे,मिजाज हवा का बदल जाता! मन गीत गाता उमंग भरा,माहौल सारा रंग जाता! शीतलता छाती अंबर पर, सूर्य संग झूमने लगता ! तुम जब आती हो मन मेरे, नशा सा है छा जाता! एक गुदगुदी होती चित में, चेहरा खिला चमकता! चंदन लिपट भावनाओं से,चिंतन सहज है करता। तुम आती पल भर ही,पर सब कुछ जैसे बदलता। बजती खुशियों की सरगम,मन नाचने है लगता!

मन परिंदा बन

देख कर उनका चहकना,झूम हूं उठती ! लगता है जैसे पैरों में उनके पायल है बंधी ! गूंजती है कानों में ऐसी चंचल नई सी धुन। जैसे पके मीठे दानों की माला रहा कोई बुन! झाड़ियों में कूद कूद कर हलचल हैं मचाती जाने कितनी बातें सखियों को हैं बताती! फिर जैसे जैसे सूर्य लगता अवसान में डूबने, अपने घोसलों को लगती ये सब भी खोजने! पत्ते भी साथ ही इनके स्थिर खामोश हो जाते। क्षितिज की लाली के साथ जब फिर सब उड़ते मेरा मन परिंदा बन, इनके साथ ही उड़ जाता! 4-2-24

मुझे शिकायत है!

ऐ मन ,तू रहता सदा साथ मेरे ! रहूं भीड़ में या होती हूं अकेले! मित्र मेरा, तू ही एक है अंतरंग! फिर क्यों करता है मेरा चैन भंग ? तुुझसे छुपी नही मेरी कोई बात। चलता रहता संंग चारो पहर साथ ! याद रखना किंतु मेरी एक बात, बांधले पल्लू में अपने तू यह गांठ ! अब जगाना छोड़ दें मुझे देर रात! तेरी यही आदत परेशान करती है! तुझसे इसीलिए ही ,मुझे शिकायत है! सीमा सिन्हा 5-2-24

“Pearls of compassion “

Why is there always a complaint,”I am hurt!” When except you and me,there’s no third? We are the closest yet we forget that to see! Your perceptions are as true,as my thoughts and me!” Let’s start once again anew, moredetermined ! Leaving behind old obstacles that thwarted! Let past no more remain in our pleasant present ! Let’s both accept and console what we lament! “Breathe compassion forcefully into clouded sky! Get drenched in their soothing rains as we fly!”

कोई समझा नही

चाहती थी मैं अपने मन की बात उसे ही बताना! मन कसक उठता ,जजबाती बन जाता अफसाना! खोल नही पाती गांठ उफन कर रह जाता पैमाना! मिल कर अपनों से,मन रहता है वैसा ही अंजाना! प्याले में खोजती हूं मेराअपना वह पुराना आशियाना! लेकिन तय हो गया है, जल्द मेरा भी इस घर से जाना! क्या कह कर समझाऊं?कैसे अपने मन को ढाढ़स दूं? ढल रही शामअब,आशा का सूर्योदय कहां से लाऊं? विभ्रान्तियां अनेक पल रहीं, सबके विचलित मन में। रख कर खुद को अलग ,ढूढ़ रहे सब प्रभू को वन में! चल रहा तन-मन,अचम्भित हूं,उस शक्ति को कैसे पहचानू? … Continue reading »कोई समझा नही

“ऐ मन!”

रखना ऐ मन,पास अपने बस कुछ ही यादें! ठहरी हैं जिनमें खुशी की वो कोमल सम्वादें! बाकी सब कर देना विस्मृति के अंक सुपुर्द ! मिटाकर उनकी आकृति,उनका सारा वजूद! बस एक बात गांंठ बांध कर रख लेना तुम ! चुभ गया हो नश्तर अगर, मिटाना उनका वहम! खोल चिलमन,उड़ा देना हवा में सारे रंजो-गम! छोड़ गलियां पुरानी,नये रास्ते पर रखना कदम! समझा देना खुद को,जानता नही अब उनको कोई ! कट चुकी है डालियां,बेजान जड़ें,मिट्टी सूखी सोई! फिर खोज कर नई मुरादें,सींचना प्यारे नये सपने, सुकून की बारिश में फूटेंगी कलियां,आंगन अपने! उड़ जाना आकाश!,बन तितली उनकी खुश्बू में! … Continue reading »“ऐ मन!”

Bihar ke veer Putra

हौसला वीरों का मुरझाता नही शरीर की कमजोरी से थक कर वीर कभी रुुकता नही, दुश्मन कीललकार से सन सन्तावन के योद्धा,बन,वीर कुंवर सिंह हुये खङे ! अस्सी साल की उम्र में,उठा तलवार अंग्रेजों से भिड़े! बन कर मां का रक्षक,उतरा जब कुंवर जगदीशपुुर में हारीअंग्रेजों की फौज ,1857सिपाही विद्रोह रोकने में! गोलियां बरस रही थीं ,नदी में नौका पर थेकुंवर सवार! लगी जब दुुशमन की गोली, बांह से निकला रक्त धार! घायल थे पर हार ना माने, उठाया कुंवर सिंह ने तलवार! ईस्ट इंडिया कम्पनी थर्रायी,घबड़ाई उसकी हारी सेना! देख कुवर की असीम वीरता आया दुश्मन को पसीना! काट … Continue reading »Bihar ke veer Putra