गुनगुना रही है ज़िन्दगी

गीत नया गुनगुना रही है ज़िन्दगी । खुल रही बात बहुत जिसमें अनसुनी । पुरानी वो उलझनें सारी सुलझ रही। सनातन तत्व की तस्वीर नई बन रही। खेल पर किस्मत के पहले रोती थी। नसीहतों से बहुत दूर मैं भागती थी। क्यों होता है ऐसा, मैं उलझ जाती थी। कैसे बदलू सबको,समझ ना पाती थी। सुन कर गीत उसका, सत्य समझ गई । बह रही थी मस्त वह धुन गुनगुनाती हुई । बगैर जाने मैं  कौन और क्या हूं चाहती। उसके साथ बस मैं भी वहीं गीत गाने लगी। इर्द-गिर्द अपने मैं अब देखती नहीं । बहे जिस ओर हवा, … Continue reading »गुनगुना रही है ज़िन्दगी

अमर शहीद

नमन मंच मानसरोवर काव्य मंचविषय-अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेवविधा-कवितातिथि -२३-३-२५शीर्षक -अमर शहीद                  “अमर शहीद ” लिख कर लाल लकीरों से कहानी,कर दिया वतन के नाम ज़िन्दगी अनगिनत ने जिया ऐसी जवानी ।धैर्य को बनाकर अपनी रवानी! सुनकर हिंद के वीरपथिको की कथा,बह पड़ा काजल बन, मां की व्यथा । गिन नहीं पाएंगे कितने बलिदानी थे?कितने भगतसिंह, राजगुरू सुखदेव थे! इन सपूतों की गिनती नहीं हो सकतीसुभाष सीकितने ही खुदीराम की थी सुमती। अत्याचारियों ने खीच ली थी अंगों की झिल्लीआहत कर तन को, नहलाया खूनी होली । फिर भी जांबाजो की ना निकली आह की बोली।रंग लिया था … Continue reading »अमर शहीद

बस इतना बता दो

तुम आओ ना आओ, मुझे बस,इतना बता दो राज़ पुराना खोल कर कहो। बांधा क्यों इतना गहरा बंधन बन गये तुम श्वासो का स्पंदन! भारी बना है जीवन हर दिन, कांटे ना कटती, लम्बे पल-छिन! समय बना है,अनसुलझा रिण विचित्र विचारों से घिरा यह मन। ऐसा क्या कर्म किया मैंने गहन अंधेरा छाया घर में आस का दीपक बुझ ना जाए कलि बिना खिले ही ना मुरझाए! लगता नहीं अब मन यह मेरा देखता हर पल आस है तेरा टूट गया मेरी नाव का बेड़ा जाने कैसे आयेगा सवेरा?

नमन मंच

मानसरोवर काव्य मंचदिनांक -१७-३-२५शीर्षक -“तुमको लगता है कि”विधा- गीत            “तुम को लगता है….” तुम को लगता है कि तुम मुझसे जीत गये .फक्र हमें हैं,मुस्कान पर तेरे दिल हार गए ।तुमको लगता …. तुम इसे जीत समझकर गुमान करते हो.तेरी मुस्कान का सौदा हम इससे करते हैं ।तुमको लगता है … तेरा रुठना भी हमें बहुत भला लगता है .इस बहाने करीब तुम्हारे हम आते हैं।तुम को लगता है इकबार ,एक नजर मुझे तुम देख लेते होकसम तुम्हारी इस बहाने मैं भी जी उठता हूं।तुमको लगता है … ज्यादा नहीं बस एक ही इनायत चाहता हूं .अलविदा कहने से पहले … Continue reading »नमन मंच

दिन महीने साल

बीतते जाते हैं दिन महीने साल हंस कर देख सूरज से पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा हाल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा पथ पर प्रेरित हो,तुझको देख रहा है नर यही बना है सहसा उसका काल स्वामित्व क्षितिज आकाश लेकर! फ़ुरसत नहीं चैन के पल दो पल भी पलकों में रहती छिपी आकांक्षा तितली दिन महीने साल लिए जीवन उड़ जाता बिसरी सीमाएं याद नहीं आती कभी ! क्या उड़ना ही है मेरी जन्म का उद्देश्य रचनाकार से रहा नहीं जब कोई सापेक्ष छूटा उससे पुराना हमारा सारा रिश्ता जिसकी अपेक्षा … Continue reading »दिन महीने साल

; ” THE UNSURMOUNTABLE”

Many a time, I wonder, watching the fleeting Clouds! They come and go without looking into any other direction, as if they were blinded from all sides alike a carriage horse, that cannot see anything, except its predestined path of journey! I wish I could send words of friendship and compassion request to these monsoon cloudes! I feel an urge ! I wish I could make it understand how dearly each of us , far and near, from the high mountains to the valleys, from the green grasslands to the dry desert sandy regions, from the temperate forests to the … Continue reading »; ” THE UNSURMOUNTABLE”

“शिक्षक को श्रद्धा सुमन”

शुभ दिवस है ,शुभ घड़ी है,अर्पित है शिक्षक को श्रद्धा सुमन !ऋणि तन मन धन उत्कृष्ट,आपको हमारा शत शत नमन ! शिक्षक शिक्षा का सुफल-शिखर,प्रज्वलित दीप प्रखर है,सृष्टि के कण कण का यह प्रहरी,इसका विश्वस्त भविष्य है। ब्रह्मांड को विनीत विधाता, जैसे देता मोहक स्वरूप है,स्वयं का परिचय देकर ,शिक्षक लिखता इसका भविष्य है। पुण्यप्रकाशित है यह धरती, है विद्यार्थी हर देशवासी ,विद्यामंदिर सर्वत्र यहाँ ,गुरु पूजते हैं सर्वत्र भारती। आशीष फलित जिनका प्रतिपल,उनको अर्पित है प्रार्थना ,गुरु का सच्चा संदेश पाकर,जागृत करें विश्व शांति-साधना! जन जन को शिक्षक दिवस की मंगल कामना!💐

रहे गई है कुछ कमी

नित करती हूं मैं नियम अनेक फिर भी पाती नहीं  तुम्हे देख। मेरे कान्हा करती हूं क्या ग़लती, व्याकुल यूं क्यों होकर मैं फिरती? कहो तुम्हारे वृन्दावन में ऐसा क्या, गोपाल बने मटकते वन में जहां? माना अच्छा ना था भोग हमारा पर अब तो हैं मेवा मिश्री भरा! रखती मैं तुम्हारी सेवा में वह सब, कृपा से तुम्हारी मेरे पास है अब। हां, ध्यान नहीं लगा पाती मैं ज्यादा भूख पीछे से पकड़ लेती मन सादा। तुम से हटकर, भोजन में मन है बसता शायद तू भी प्रेम-कृपा नहीं है करता! चाहती हर पल मैं,तेरा ही दर्शन करना,   … Continue reading »रहे गई है कुछ कमी

“मुझे चाहिए!”

एक सखा  सौहार्दपूर्ण चाहिए जो सुन ले। मेरी हर बात अपने पास सुरक्षित रख लें।। गलतियों को मेरी ढक कर दफन जो कर दे। दुखते जिगर के तार को स्पर्श कर सुकून दे ।। गम्भीर उसके बोल यूं हृदय में मेरे पैठ जायें। सुनकर जिसे मिट जायेअपेक्षा-मनोव्यथायें।। हो उसके पास ऐसा वह धन, सन्तोष की ताबीर। रंग दे सहज मन को खुश्बू में जैसे गुलाल-अबीर।। जरूरी नही,रहे वह गिरफ्त में मेरे पास सदा। लेकिन करले स्वीकार मेरी अच्छी-बुरी अदा।। तटस्थ वह रहे सदा जैसे सूर्य का नया सवेरा। भरा हो जिसमें चहचहाहट , मुस्कुराता चेहरा।। मेरे हर अनुभव को कर … Continue reading »“मुझे चाहिए!”

सीता का प्रश्न

3 ” “ दीपक की प्रज्वलित शिखा संग सगुण मुखरित यौवन ।मधुर कर रहा था दीपावली काअयोध्या में पुनरागमन।। लव -कुश को समर्पित प्रजा-पोषण राज सुरक्षा पालन।पूर्ण धरा धर्म स्थापन कर,शेष शैया विराजे थे नारायण ।। अनुकूल न थी श्वास, सिसक रहा जैसे नेपथ्य आवरण।क्षुब्ध करुण बना था शेष शैया, क्षीरसागर का शान्त वातावरण।। अप्रसन्न,अश्रुरंजित क्षीण ,मुदित न था अष्टलक्ष्मी मन।गम्भीर उदास था,चंचला का विलक्षण मृदुल सौंदर्य चितवन।। लक्ष्मी के पलकों मे ठहरे हुए धे असीमित अश्रु कण।स्थिर बनी वह बैठी थी,पर धीर हीन सी ध्यान मग्न ।। आज अचानक एक आक्रामक निश्चय उठा उनके मन।प्रश्न पूछने का प्रानप्रिय से,था … Continue reading »सीता का प्रश्न