गुनगुना रही है ज़िन्दगी
गीत नया गुनगुना रही है ज़िन्दगी । खुल रही बात बहुत जिसमें अनसुनी । पुरानी वो उलझनें सारी सुलझ रही। सनातन तत्व की तस्वीर नई बन रही। खेल पर किस्मत के पहले रोती थी। नसीहतों से बहुत दूर मैं भागती थी। क्यों होता है ऐसा, मैं उलझ जाती थी। कैसे बदलू सबको,समझ ना पाती थी। सुन कर गीत उसका, सत्य समझ गई । बह रही थी मस्त वह धुन गुनगुनाती हुई । बगैर जाने मैं कौन और क्या हूं चाहती। उसके साथ बस मैं भी वहीं गीत गाने लगी। इर्द-गिर्द अपने मैं अब देखती नहीं । बहे जिस ओर हवा, …