“भैया दूज”

बचपन की कुछ प्यारी यादें,आज आप से करती हूं साझा। जीवन होता था सरल बहुत तब,पारदर्शी थी व्यव्हारिकता ! परिवार हमारा साथ मनाता त्योहार ,एक ही आँगन में जुट, सबको यही चिंता रहती,कोई भाई बहन ना जाए इस खुशी से छूट! भाई दूज पर मिलता पीठा – चटनी,और फुआ बताती बासी खाने की रीती। चना दाल की पूड़ी, खीर, आलू-टमाटर-बैगन-बड़ी की सब्जी! गोबर से उकेर कर चौक,कोने में सजाते पान-मिठाई- बूंट । दीर्घायु होवें सब भैया हमारे,हम बहनें पूजती शुभ “बजरी” कूट! चुभाकर “रेंगनी” का कांटा,सभी जोगतीं काली नजर का जोग टोना। फिर जोड़ती आयु लम्बी,मनाती भौजी का रहे सुहाग … Continue reading »“भैया दूज”

Daughter ‘s day

Happy Daughter ‘s Day अपनी सब बेटी को हम सबका प्रेम भेंट , “सहचरी अभिन्न बन गई, आज वह हमारी है,ममता की छाँव पसारे,वह विशाल घनेरी है ,जन्मा हमने, पर सहसा बन गई माता हमारी है ,कहूँ किन शब्दों में,मन उसका कितना आभारी है।बहुतेरे आकांक्षाओं की वह बनती सदा सहभागी है।ईश का असीम स्नेह बन, बेटी घर सबका भरती है ।” शमा सिन्हा29-9-’20

बादल का आना

रंग छाया नभ पर श्यामल। जैसे उड़ा अंगवस्त्रं  मलमल।। काला हुआ सावन का अचकन । आंखों से उसके रंगा पसरा अंजन।। पंख फैलाकर आए उडते  बादल । बिजली ने कौंधाया चांदनी चपल।। परिंदे,खोज रहे घोंसले की दिशा। जाग रही चहुंओर जीवन जिजीविषा।। स्वरचित एवं मौलिक शमा सिन्हा रांची।

कहूं किससे?

इस हाल को करूं बयां किससे ? इस उम्र में सुकून मिले जिससे।। जोड़ कर तिनका बनता घोंसला। बारिश में  रखने को हौसला ।। अगर परिंदा सदा उड़ता ही रहे। भींगीं पलकें कभी खुल ना पायें ।। लोगों कहते,”रात बितालो मेरे यहां!” पर रात भर में कटेंगी न सारी सांसें वहां? और ग़र पंख उसके सदा भींगते ही रहें। चौखटों पर, औरों के फुदकता फिरे।। ऐसे घोंसले का क्या उसे  है फायदा । जिसके रहते भी वंह रहे सुकून से जुदा? शमा सिन्हा मुंबई ८-७-२४

कुछ बातें ना कहूं तो अच्छा

चेहरे के भाव कह जाते हैं वह सब छुपा लेते हैं जिसे चतुर शब्दों से लब! जताई थी शायद उसने मुझसे सहानुभूति, चेहरे ने कर दी कुछ और अभिव्यक्ति! भारी था सिर मेरा,तप रहा था शरीर, पर समझी, उसके आंखों के इशारे गम्भीर! “आप अड़ कर उधर बैठ क्यों नहीं जाती? सारा समय लेटे रहना ठीक नहीं!” लगा जैसे विधी ने चुभाया हो कांटा, आवाज़ आई”घर से अबअपना आसन हटा!” जीवन के अंतिम पड़ाव का  बचा रास्ता, छोटी तकलीफ करती जहां हालत खस्ता! घर था उसका मैं कह क्या सकती थी? रजामंदी उसकी, मेरी उपस्थिति तोलती! रोटी ही नहीं, हर … Continue reading »कुछ बातें ना कहूं तो अच्छा

हे नारी !

बन गई जो तुम दुर्वा जैसी, पैरों तले दबा दी जाओगी! कोमल लता जो अगर हुई , श्वास तुम्हारी सहारा खोजोगी! अगर झाड़ की एक डाल बनी, आड़ी तिरछी ही बढ़ पाओगी! अगर तुम वट वृक्ष विशाल बनी, सशक्त हो, सबकी पूज्य बनोगी! करो अपनी आत्म चेतना जागृत, पान करो बस स्वंय शक्ति अमृत! सिद्धी तुम खुद अपनी बन जाओ ! त्याग अपेक्षा, बनो सत्य समर्पित , तब ही संतुष्ट जीवन जी पाओगी!

मैं उकताने लगी हूं जिंदगी से

हो रहा मानव विकराल, लेकर अपनी भूख को। भूल गया है वह नैतिकता की सारी चौखट को।। दारू और व्यसन को खरीदा, देकर उसने ईमान। स्वदेश-सुखद-भविष्य का किया स्वयं देहावसान।। समाज को  बढ़ते देख निघृष्ट अंधेरे दिशा  में ऐसे। घिरी निराशा से,मैं उकताने लगी हूं ऐसी जिंदगी से ।। पचहत्तर साल की स्वतंत्र विधा ने पाया है बस हमसे। लूट-खसोट, छीना-झपटी,अनन्याय,अत्याचार तरीके।। भूला  प्रताप, शिवाजी, अहिल्या रानीझांसी इतिहास । करते रहे मन से परतंत्र पराधीनता का कारागार वास।। अनभिज्ञ विरासत से,गाते रहे आक्रमणकारियों का दंश। भूला सगर, दिलीप,विक्रमादित्य,लाजपत, वल्लभ वंश।। रख कर स्वदेश स्वाभिमान ताक पर, तुच्छ अज्ञानता से। देख सामाजिक … Continue reading »मैं उकताने लगी हूं जिंदगी से

परेशानी

किसकी बात करें,किसको हम भूलें पेशानी पर छाई रहती सबकी लकीरें, हटा सकते नहीं हम सम्बन्ध का जाल मन के हर कोने ने रखा इनको पाल। किसी का आना हो,किसी का जाना अपेक्षित परिणाम की जगती है वासना शब्द के जाल बन जाते श्वासो पर फन्दे, माथे पर बूंदें उभरती हैं जब वो हैं गूंजते! सुलझा सकते नहीं इन्हें, अनेक गांठ डालते, इच्छाओं की फरियाद के साथ घुटते रहते ! 23.5.24

मजदूर

चौराहे पर गाड़ी हमारी रुकी हुई थी हम अंदर बैठे, सपरिवार ठंडी हवा ले रही थीं खड़े ट्रक पर हमारे भवन की गिट्टी लदी थी उस पर एक मज़दूरिन,बदहवास पड़ी थी! “मई महीने की धूप फिर भी ऐसी नींद! अजब रचना है , गिट्टी भी नहीं जाती बींध!” मेरी बगल में बैठे मेरे पति ने सहसा टोका मैंने उसको देखा और अपनी स्थिति भांपा! धात्री-तन से चिपका था एक नन्हा शिशु आश्वस्त,   उसका विश्वास कर रहा था मेरे अहं को ध्वस्त ! ईश्वरीय विविधता पर, मैं शब्द विहीन थी मूक! समझ ना पाई सहानुभूति दिखाऊ या करूं दु:ख? चौराहे … Continue reading »मजदूर

नया सवेरा

आज जब सूरज आया, जगाने लेकर नया सवेरा, मुुग्ध देख ,उसकी छटा निराली देने लगी मैं पहरा! स्नेेह अंजलि मध्य समेट चाहा  उसे  घर लाना! वह नटखट छोड़ मुझे चाहा आकाश  चढ़ना! होकर  मैं लाचार, लगी देख ने उस की द्रुत चाल, सरसराता निकल गया वह,भिंगोकर  मेरी भाल! “तुुमही जीत  गये मुझसे!” कहा उससे मैनें पुकार । “अभ्यास कर्म है नित का!”बताया सूूर्य  ने सार ” कर्त्तव्य करो!तुलना करने से ही सब जाते हैं हार! चरैवेती!चरैवेती!कर्म-चेतना करेगी हर कठिनाई  पार!”